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परन्तु वैज्ञानिक प्रवृत्ति ने अपने अन्वेषण में यह महसूस किया कि बालक का विकास समाज के विकास के बिना असंभव है । अर्थात् व्यक्ति का हित समाज हित के साथ और समाज का हित व्यक्ति के हित से अनुपूरक रूप से गुथा हुआ है । दोनों का एकांगी विकास नहीं हो सकता
इस आधुनिक युग में शिक्षा की समाहारिक प्रवृति का विकास हुआ । इसके प्रभाव से शिक्षा के वैयक्तिक तथा सामाजिक उद्देश्यों में समन्वय किया जाने लगा । स्वयं स्पेन्सर जहाँ एक ओर मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का समर्थन करते हुए व्यक्ति वाद का प्रोत्साहन देते है | वहीं दूसरी ओर यह भी बताते कि व्यक्तित्व का विकास केवल सामाजिक हित दवारा ही संभव है । वर्तमान में सभी शिक्षाशास्त्री एक मत से स्वीकार करते है कि व्यक्ति और समाज के हित अलग-अलग नहीं है व्यक्ति का विकास और सामाजिक कुशलता एक दूसरे के पूरक है । अत: शिक्षा के उद्देश्यों में व्यक्तिगत उद्देश्य और सामाजिक उद्देश्यों के बीच समन्वय स्थापित कर लिया गया है । जैसे ‘रुचि और प्रयत्न’ के बीच समन्वय स्थापित हो गया है । जहाँ व्यक्तिवादी विचारधारा बालक की रुचियों को महत्व देती है । समाजशास्त्री विचारधारा प्रयत्न को अधिक बल देती है । वर्तमान की नवीन अवधारणाओं में रुचि और प्रयत्न के सिद्धान्त को स्वीकार किया जाता है । अधिगम के लिए जितनी आवश्यकता रुचि की है उतनी ही प्रयत्न की । बिना प्रयत्न किये रुचि होते हुए भी परिणाम प्राप्त नहीं किया जा सकता । अत: पाठ्यक्रम निर्माण और शिक्षण विधियों में अब दोनों को समान महत्व दिया जाता है ।
तदनुसार ‘अनुशासन और स्वतंत्रता’ दोनों कभी विरोधाभासी माने जाते थे लेकिन वर्तमान की शिक्षा प्राणाली में दमनात्मक अनुशासन के स्थान पर प्रभावात्मक व मुक्तात्मक
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(i) ।
(iv)
अनुशासन पर बल दिया जाता है । नवीन शिक्षा प्रणाली में बालक में आत्म निग्रह आत्म प्रबन्धन, आत्म शिक्षा, आत्म अनुशासन, स्वानुशासन जैसे गुणों के विकास का प्रयत्न किया जाता है ।।
| अस्तु शिक्षा क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रवृत्ति के आधार पर मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति के बीच समन्वय स्थापित कर लिया गया है जिसे शिक्षा की नवीन प्रवृत्ति, समहारक प्रवृत्ति के नाम से जाना जाता है) इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं
शिक्षा की समाहारक प्रवृत्ति शिक्षा के वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्यों के बीच
समन्वय स्थापित करती (ii) समाहार प्रवृत्ति के कारण आधुनिक शिक्षा में मनोविज्ञान और समाजशास्त्र शिक्षा के
आधार बन गये है । समाहारक प्रवृत्ति ने शिक्षा में ‘रुचि और प्रयत्न’ का सिद्धान्त निर्मित किया है ।
इस प्रवृत्ति ने बालक की प्रकृति और समाज के बीच शिक्षा में समन्वय किया है । (v) इस प्रवृत्ति ने स्वतंत्रता और अनुशासन के बीच समन्वय स्थापित कर आत्म अनुशासन
और प्रभावात्मक अनुशासन की स्थापना की है । 2.5.5 शिक्षा की अति आधुनिक प्रवृत्तियाँ
विज्ञान के चरम विकास ने आधुनिक युग को भौतिकवादी युग बना दिया है । स्वास्थ्य सेवा के प्रसार और जिनेटिक इन्जीनियरिंग ने तीव्र जनसंख्या वृद्धि की है । अत: प्राकृतिक संसाधनों का असीमित दोहन प्रारंभ हुआ । -उपभोक्तावादी दृष्टि से मानव मन के संतोष को समाप्त कर दिया । अत: मानव समाज जिसने लोकतांत्रिक, समाजवादी विचारधारा को अपना कर अपनी सभ्यता को इस सोपान पर पहुंचाया है, अनेकों प्रकार की समस्या का सामना कर रहा है । शिक्षा समाज की समस्याओं को व्यवहारिक समाधान की तलाश का प्रयत्न है । अत: शिक्षा द्वारा जब इन अनेकों समस्याओं के समाधान की खोज प्रारंभ हुई तो शिक्षा में कुछ नवीन प्रवृत्तियों का विकास होता है । यद्यपि ये प्रवृतियाँ सामयिक है परन्तु शिक्षाशास्त्र के अध्येता को उनको जानना आवश्यक होता है जैसे(i) निरक्षर प्रौढ़ो के लिए प्रौढ़ शिक्षा । (i) जन शिक्षा हेतु दूरस्थ शिक्षा । (i) कार्मिक जनो हेतु पत्राचार शिक्षा । (iv) । विद्यालय रहित अनौपचारिक शिक्षा । (v) मन्दबुद्धि, विकलांग जनो हेतु विशिष्ट शिक्षा ।
इसी प्रकार सामयिक समस्याओं के समाधान हेतु कुछ विशिष्ट अनुशासनों की स्थापना की गयी है। (i) । जनसंख्या शिक्षा ।। (ii) पर्यावरण शिक्षा । (iii) । यौन शिक्षा । (iv) सामुदायिक सेवा शिक्षा ।
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उपभोक्ता शिक्षा । (vi) अल्पसंख्यक शिक्षा । (vii) ऊर्जा शिक्षा । (viii) कम्प्यूटर शिक्षा | (ix) व्यावसायिक शिक्षा । (x) प्रबन्ध शिक्षा
उपरोक्त प्रवृत्तियाँ सामयिक और नवीन है परन्तु आपात प्रबन्ध शिक्षा के इन क्षेत्रों में तीव्र विकास हो रहा है, क्योंकि मानवता के समक्ष जो भी समस्यायें उत्पन्न होती है । वह शिक्षा के द्वारा समाशोधित होती है । इस प्रकार प्रत्येक मानवीय समस्या शिक्षाशास्त्र की एक नवीन प्रवृत्ति से अलंकृत कर देती है । और यह प्रवृति समाज की नवीन आकांक्षा बन जाती है। कालान्तर यह शिक्षा का उद्देश्य बनकर शिक्षा प्रक्रिया में अपनी भूमिका स्थापित करती है । अत: यह कहना अनुपयुक्त नहीं होगा कि शिक्षा की प्रवृत्ति शिक्षा के उद्देश्यों में प्रतिबिंबित होती
2.6 सारांश
प्रस्तुत इकाई में शिक्षा के लक्ष्यों एवं प्रवृत्ति में यह स्पष्ट करने का प्रयत्न किया गया है कि शिक्षा एक जटिल और बहुत संकल्पना है, इसके उद्देश्यों का निर्धारण सामाजिक सांस्कृतिक प्रवृत्तियों सामाजिक दर्शन, तात्कालिक आवश्यकतायें होती है । समाज को देश और काल से जो अपेक्षा होती है वह शिक्षा के माध्यम से पूरी की जाती है । अत: ठीक ही कहा जाता है कि शिक्षा समाज शास्त्र और दर्शन शास्त्र का व्यावहारिक पहलू है । शिक्षा के विभिन्न लक्ष्य जैसे- व्यक्तिगत लक्ष्य, सामाजिक, आर्थिक राजनैतिक लक्ष्यों में समन्वित दृष्टि का विकास करते हुए विभिन्न प्रकार के उद्देश्यों की पृथक-पृथक चर्चा की गई है । जैसे शारीरिक विकास, मानसिक विकास, चारित्रिक विकास, आदि को समविकास या पूर्ण जीवन के विकास पर आत्मबोध के विकास के साथ समन्वित रूप से प्रस्तुत किया गया है । 2.7 मूल्यांकन प्रश्न

  1. लक्ष्य एवं उद्देश्यों के सम्प्रत्यय स्पष्ट करते हुए इनमें अन्तर बताइये ।। 2. विभिन्न शिक्षा आयोगों द्वारा शिक्षा के लक्ष्य के सम्बन्ध में क्या विचार प्रस्तुत किये
    गए? विवेचना कीजिए । 3. नैतिक एवं चारित्रिक विकास के लक्ष्य निर्धारण में शिक्षा की भूमिका स्पष्ट कीजिए । 4. शिक्षा की वर्तमान प्रवृतियों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए ।
  2. शिक्षा की समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति एवं समाहरक प्रवृति के लक्ष्यों को स्पष्ट कीजिए । 2.8 संदर्भ ग्रंथ
  3. त्रिपाठी, डॉ० शालिग्राम – शिक्षा सिद्धान्त, कनिष्क पब्लिशर्स, दरियागंज, नई दिल्ली ।
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  4. जॉन डिवी – शिक्षा और लोकतंत्र, ग्रन्थ शिल्पी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, लक्ष्मी नगर,
    नई दिल्ली। 3. पाठक, पी.डी. एवं त्यागी, जी.एस – भारतीय शिक्षा आयोग, विनोद पुस्तक मन्दिर,
    आगरा 4. सक्सैना, एन.आर.स्वरूप – शिक्षा के दार्शनिक एवं समाजशास्त्रीय सिद्धान्त | 5. ओड, एल.के. – शिक्षा की दार्शनिक पृष्ठभूमि, हिन्दी नथ अकादमी, जयपुर । 6. भटनागर, सुरेश – आधुनिक भारतीय शिक्षा आर. लाल बुक डिपो, मेरठ 7. त्यागी ओंकार सिंह एवं डा. सिंह विजेन्द्र – उदीयमान भारतीय समाज और शिक्षा,
    अरिहंत शिक्षा प्रकाशन 8. भटनागर, सुरेश – कोठारी कमीशन, आर. लाल बुक डिपो, मेरठ 9. त्यागी, जी.एस – शिक्षा के दार्शनिक एवं सामाजिक आधार, विनोद पुस्तक मन्दिर